आज इस ब्लॉग पोस्ट में बात करने जा रहे है महाभारत के एक मशहूर योद्धा कि जिसे लोग दोस्ती और दानवीर की मिशल दिया करते है जी हाँ उनका नाम है अंगराज कर्ण क्यूंकि इन्हें ये पता था कि मेरी मृत्यु निश्चित है फिर भी इन्होने अपने मित्र का साथ दिया जिन्होंने दान में अपने प्राण तक दान कर दिए ऐसे व्यक्ति के ऊपर मैं कुछ पंक्तिया ढूंढ के लाया जो आपको लोगों के समक्ष प्रस्तुत है- Karn Ki Kahani
कड़कड़ कर विध्वंस मचाते उतरे सारे वज्र धरा,
पर सरसर गिरती वर्षा पहुंची जैसे तैसे वसुदा के घर।
तीनों लोक में मज गई हलचल, समय ही ऐसा गुजरा था,
भाई मां जमुना भीतर एक बालक सूरज बनकर उतरा था।
इतिहास का जो काला पन्ना सबने मिलकर फाड़ दिया,
धर्म के नीचे योद्धा को एक धर्मी कहकर गाड़ दिया।
गाथा ये उस वीर की जिसके रोम रोम में दिनकर हो,
जिसे दाह मिला जीवन भर जैसे बेलपत्र बिन शंकर हो।
अब शेष बची कहानी उनकी हम तो सुना ना पाएंगे,
कहानी को विस्तार स्वरूप खुद करण सुनाने आएंगे।
कि यह अभी की है नहीं द्वापर की बीती बात है,
जहाँ कौन किसका है सगा और कौन किसके साथ है।
यह अभी की है नहीं द्वापर की बीती बात है,
जहाँ कौन किसका है सगा और कौन किसके साथ है।
जहाँ कौन है माता पिता और कौन भाई बंध है,
जहाँ बिच रही लाशों पर बैठे स्वयं परमानंद है।
जहाँ वंश के आधार मुझको व्यर्थ बतलाया गया,
और हक किसी का छीनने में अर्थ बतलाया गया।
जहाँ दुर्योधन ही है सभी, बस पक्ष उनके हैं अलग,
जहाँ बस कपट की बात है, बस कक्ष उनके हैं अलग।
कृष्ण ही बस धर्म की यहां डोर लेकर चल रहे,
गोविंद ही बस है यहां जो दुख में हस कर जल रहे।
उनके अलावा कौन है आगे जो मेरे टिक सके?
अरे वह स्वयं ही है परम, ले अवतार ही जो दिख सके।
और रण में जो कुछ भी हुआ मैं उसको ना दोहराऊंगा,
मैं सत्य कहने आ गया हूं, सत्य कह के जाऊंगा।
मैं चुनूंगा दुर्योधन बोले — दुर्योधन तुम ना चुनो,
पर मुझ धर्म से प्रथम तुम धर्म क्या है वो सुनो।
कि धर्म और अधर्म की बुनियाद ही अगर कर्म है,
और कर्म से निर्मल है जो, अगर उसके संग में धर्म है।
तो कह दो काना, इस जहां में दान करना पाप है,
और इस जहां में सूत के घर जन्म लेना श्राप है।
कह दो क्षत्रियों को जाकर बाण को तुम फेंक दो,
और रण में खींची प्रतिचा पर गोत्र रख कर देख लो।
अरे युद्ध रण पे था ही नहीं, व रण ही अंतर मन में था,
और योग्यता की लाश वन में गिर गया उस रण पे था।
श्राप और वचनों के जब मैं मर रहा था डेरे पर,
तब कर्ण को इस मार डाला भगवानों ने घेर कर।
पर एक मित्र था, पर एक मित्र था,
जो मित्रता की था कदर करता मेरे।
दुर्योधन ही था जो संग सफर करता मेरे।
फिर वो चुनेगा लक्ष्य को और मैं प्रत्यंचा तान दूं,
अरे उसके खातिर ना तो फिर मैं किसके खातिर जान दूं?
100 भी अर्जुन आ गए, 100 भी अर्जुन आ गए,
तो 100 से भीड़ में जाऊंगा,
और जो कहा था पहले भी मैं फिर उसे दोहराऊंगा।
कि ये पांडवों को तुम रखो, पांडवों को तुम रखो,
मैं कौरवों की भीड़ से —
तिलक शिकस्त के बीच में, जो टूटे ना वो रीड में।
सूरज का अंश होके फिर भी हूं अछूत मैं,
आर्यवर्त को जीत लूं, ऐसा हूं सूत पूत मैं।
कुंती पुत्र हूं मगर हूं उसी को प्रिय मैं,
इंद्र मांगे भीख जिससे — ऐसा हूं क्षत्रिय मैं।
और जो लिखा नसीब में वही सत्य क्यों यहां?
जो तुम्हारे बस में ना हो उसको सत्य क्यों कहा?
हर बार वर्तमान को नियति क्यों हो थोपते?
और मैं जवाब मांगू तो क्यों ‘नियति नियति’ भोंकते?
नियति की कोई भूल नहीं, इसे निष्ठुर अपमान कहो।
कौनते या नहीं राधेय या कर्ण — मुझे अधिरथ की संतान कहो।
कुंती का मैं अंश नहीं, ना मुझसे उसका नाता है,
मैं कर्ण हूं तो बस कर्ण ही हूं — जो सूत पुत्र कहलाता है।
आओ अब बताऊं, महाभारत के सारे पात्र —
ये भोले की सारी लीला थी, कृष्ण के हाथ सूत्र थे।
बलशाली बताया जिन्हें — वो सारे राजपुत्र थे,
काबिल दिखाया बस लोगों को ऊंची गोत्र के।
ये गोत्र वर्ण जात पात सब कली के नाम है,
द्वापर में बीते कल से ही तो कलयुग बदनाम है।
तभी सोने को पिघला के डाला सोन तेरे कंठ में,
नीची जाति हो के किया वेदों का पठन तूने।
गुनाता तेरा — यही तो सारथी कांश था,
तो क्यों छिपे मेरे पीछे?
मैं तो उन्हीं का वंश था।
ये ऊंच नीच की ही जड़ वो अहंकारी द्रोण था,
वीरों की उसकी सूची में अर्जुन के सिवा कौन था?
अगर धनंजय ही श्रेष्ठ था तो क्यों डरे एकलव्य से?
मांगा क्यों अंगूठा?
क्यों जताया पृथ भव्य है?
ज्ञान पथ पर बिखरे जो, दिखाए काटे वो गुरु —
ज्ञान सबकी थाली में समान बांटे वो गुरु।
गुरु वो है जिनके होते सृष्टि खिलाती है,
गुरु के चरणों पर ही तो दृष्टि तिल मिलाती है।
अब बताओ — कैसे मैं उस द्रोण को गुरु कहूं?
जो मुझको शिष्य ना कहे — मैं उसकी घृणा क्यों सहूं?
भले पार्थ के ही इर्दगिर्द रची हुई कथा है ये,
और पार्थ से जो श्रेष्ठ था — उस कर्ण की व्यथा है ये।
रथ पे सजाया उसने कृष्ण–हनुमान को,
योद्धाओं के युद्ध में भिड़ाया भगवान को।
नंदलाल तेरी ढाल पीछे अंजनेय थे,
नियति कठोर थी, जो दोनों वंदनीय थे।
इन ऊंचे ऊंचे लोगों में मैं ठहरा छोटी जात का,
खुद से ही अनजान मैं — ना घर का ना घाट का।
सोने सा तन मेरा, अभेद मेरा अंग था,
कर्ण का कुंडल चमके — लाल नीले रंग का।
इतिहास साक्ष्य है — योद्धा में निपुण था,
बस एक मजबूरी थी — मैं वचनों का शौकीन था।
अगर ना दिया होता वचन मैंने कुंती माता को,
तो पांडवों के खून से मैं धोता अपने हाथ।
और मैंने यह कहा नहीं कि मैं सही और सब गलत।
पर मेरी गलती गलती है — और उनकी गलती बात अलग।
हाँ, द्रौपदी के संग जो हुआ उसमे मेरी भूल थी,
पर दूसरे क्षण आंख मूंद मैंने वो कबूल की।
पर द्रौपदी ने जो किया — वो कैसे केशव भूलूं मैं?
कैसे भूलूं वो स्वयंवर — कैसे विश्व पी लूं मैं?
साम, दाम, दंड, भेद — सूत्र मेरे नाम का।
गंगा मां का लाडला मैं — खामखा बदनाम था।
कौरवों से हो या की — भी कोई कर्ण को ना भूलेगा।
जाना जिसने मेरा दुख — वो कर्ण कण बोलेगा।
भास्कर पिता मेरे — हर किरण मेरा सुवर्ण है।
वन में अशोक में तू — तो खाली पर्ण है।
कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी में मेरा भी लहू जीर्ण है,
देख छान के उस को — कण–कण में कर्ण है।
अब इस कण के लौटने का समय आ चुका है,
लेकिन जाते जाते आपके दो सवालों के जवाब —
शायद कर्ण देके जाएगा।
एक — मैं कर्ण हूं तो मैं अर्जुन विरोधी हूं?
नहीं — मैं हालातों के विरोध में था, अर्जुन के कभी नहीं।
और दूसरा — तुम कर्ण हो तो कृष्ण से द्वेष करते हो?
नहीं — यह सब करने के लिए मुझे कृष्ण की लीला ने ही कहा था।
फर्क बस इतना है — अर्जुन को सब मिला है,
मुझे सब पाना पड़ा है।
इसीलिए तुम चाहकर भी अर्जुन जैसा महसूस नहीं कर पाते,
कभी आपको हुआ ही नहीं कि मैं अर्जुन हूं —
लेकिन हर बार लगता है मैं कर्ण हूं।
और जाते जाते कर्ण कहेगा —
बीते कल को छोड़ दो — अब आने वाला आएगा,
बीते कल में जो हुआ — वो कल तुम्हें सताएगा।
हर एक मोड़ पे तुम्हें अर्जुन खड़े मिलेंगे,
अब पथ में फूलों के अलावा काँटे भी खिलेंगे।
कई द्रोण मिलकर तुम्हें नीचे खींचते रहेंगे,
बेवजह कई शोर भी जलेंगे।
तब आईने में देखकर खुद को दुम निहारना,
और भीतर तुम्हारे सो रहे उस कर्ण को पुकारना।
फिर चाहे जितने युद्ध हों किसी भी कुरुक्षेत्र में,
तुम्हारा तीर पहला होगा — हर पंछी के नेत्र में।
और तुम्हारी योग्यता के खातिर,
अगर तू खुद प्रत्यंचा खींचेगा —
तो वर्तमान में हर बार कर्ण जीतेगा।