सलीम कौसर की सम्पूर्ण शायरी:
हेल्लो दोस्तों आज हम इस ब्लॉग पोस्ट में ऐसे शायर के बारे में बट करने जा रहे है जो अपने समय के मशहूर शायरों में से एक है इनका जन्म पाकिस्तान के खुशाबी जिले में सन 1947 में हुआ था |इनके लेख में अआप्को लोगों के बेहतरीन शायरी देखने को मिलेगी जिसमें प्यार, जुदाई, दर्द, मोहब्बत की नर्मी, यादें, और तन्हाई देखने को मिलते है इनकी शायरी भारत और पकिस्तान दोनों देशो में सुनी जाती है |ये पकिस्तान के मशहूर शायरों में ऐसे एक है |ये अपने ज़माने में बहुत लोकप्रिय शायर हुआ करते थे
में ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोंचता कोई और है सरे आईना मेरा अश्क है, पसे आइना मेरा कोई और है
तुम भी सच हो जो तुम कहते हो वो भी सच है में भी सच हूँ जो कुछ में कहता हूँ वो भी सच है
कभी लौट आये तो पूछना नही देखना उन्हें गौर से जिन्हें रस्ते में खबर हुए, कि ये रास्ता कोई और है
तुम्हारी चुप्पी भी एक कहानी कहती है,
पर मैं उसका मतलब अब भी नहीं समझ पाया
तुम्हे कैसे बताये हम मोहब्बत और कहानी में कोई रिश्ता नही होता कहानी में हम वापस भी आते है लेकिन मोहब्बत में कोई रास्ता नही होता है
तुमसे दूर जाकर पता चला,
सांसें भी इजाज़त लेकर चलती हैं
भूरे पेड़ों पे शाखों पे तो गुलाब आते है तू कहीं है तो चला आ तेरे ख्वाब आते है जान लेवा है मुशाफत में अकेलापन भी सिर्फ मौसम नही,रस्ते भी ख़राब आते है
दुनिया भर के अख़बारों में उलट पलट कर रोजाना ही एक खबर छप जाती है कल भी जब अख़बार आएगा उसमें भी बस नाम बदल जाने है मस्क्सुदा लाशों के चेहरे किसने पहचाने है
में किसी के दस्ते तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़ ए दुआ में हूँ में नसीब हूँ किसी और का मुझे मांगता कोई और है
मैंने खोया क्या, ये मैंने कभी पूछा ही नहीं,
पर तुम्हें खोकर लगा कि सब चला गया
तुम्हारी खामोशी भी एक सवाल करती है,
जिसका जवाब मेरे पास नहीं
मेरी हर धड़कन में आज भी तुम बसे हो,
ये अलग बात है तुम सुन नहीं सकते
तुम्हारे याद करने से क्या हो जाता…
मैं आज भी वही हूँ, जो तुम्हारा था
बुझने लग जाये तो फिर शम-ए जला दी जाये मेरी आँखे मेरे दुश्मन को लगा दी जाये या तो खुर्सीद चमकता रहे पेशानी में या लकीरे मेरे माथे कि मिटा दी जाये
दुखना तो अपने किसी रवैये पे खुश रहना खुश रहना तो अपने किसी बात पे ही खुश रहना
किसी दिन तुम याद आओगे तो समझोगे,
किसी को खोकर क्या खो देते हैं
मैंने तुम्हें भूलने की कोशिश की,
लेकिन हर राह तुम तक ही जाती है
हुस्ने-बे-महार तेरी आग में जलने के लिए अब भी कुछ लोग है चुप-चाप पिघलने के लिए और तुम भला क्या नई मंजिल की बशारत दोगे तुम तो रास्ता नही देते हमें चलने के लिए कैद करता है रिहाई के बहाने वो सलीम और फिर राह नही देता निकलने के लिए
तेरे बाद किसी को नज़र में बसाया नहीं मैंने
दिल अगर तोड़ना था तो फिर लौट के आया नहीं मैंने
कुछ इस तरह तेरी पलकें मेरी पलकों से मिला देती हो
तुम सो जाती हो… मुझे नींद आ जाती है
कभी तुम याद आओ तो उदासी बढ़ सी जाती है
ये दिल भी कितना नादान है, समझाया नहीं जाता
हमारा हाल पूछते हो? यही काफी है
वो जो छोड़ कर गया था… आज भी याद आता है
जुदाई में भी एक लुत्फ़ है, इसका एहसास तब हुआ
जब तुम सामने होते हुए भी मेरे न रहे
तुम्हें भूलना भी चाहा तो भूल न सके
तुम मेरे ‘आज’ भी हो, ‘कल’ भी हो और ‘कल’ के बाद के भी
चले थे प्यार की तलाश में, पर मिला दर्द
अब तो खुद से भी नज़रें मिलाते डर लगता
कभी तुम दूर हो जाते हो तो लगता है,
जैसे खुद से मेरा नाता टूट सा गया हो
तुम्हारी मुस्कान का असर कुछ ऐसा था,
दर्द भी दिल में आकर बैठ जाता था
दिल को जितना समझाऊँ, उतना ही रोता है,
तुम्हारी यादों का कोई इलाज नहीं
दिल को तुम्हारी यादों का सहारा है,
वरना ज़िंदगी तो कब की टूट चुकी थी
निष्कर्ष:-
सलीम कौसर उर्दू शायरी की उस परंपरा के शायर हैं, जहाँ शब्दों की चमक से ज्यादा भावनाओं की सच्चाई मायने रखती है। उनकी ग़ज़लें न केवल प्रेम, दर्द और जुदाई को नए ढंग से बयान करती हैं, बल्कि पढ़ने वाले के दिल में गहराई तक उतर जाती हैं।
सरल भाषा, नरम एहसास और दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति—यही उनकी पहचान है।
इसी वजह से उनकी शायरी न सिर्फ पाकिस्तान और भारत में, बल्कि दुनिया भर के उर्दू प्रेमियों में आज भी उतनी ही पसंद की जाती है